दिन वो पुराने लगते है बेहद सुहाने
दिन भर मस्ती और शाम को पापा के ताने
वो स्कूल ना जाने के नए नए बहाने
और यारों के साथ खेल के दिन बिताने
एक टॉफी से ही रूठे यार मान जाते थे
हाथ मिलाते ही सारे शिकवे गिले मिट जाते थे
न होती थी खाने की चिंता न घर जाने की फिकर
जब बनाते थे कागज की नाव और मिट्टी के घर
मिट्टी से कपड़ो को गंदा करके घर आना
मम्मी का प्यार से फिर सजा वो सुनाना
वो भाई बहन का बात बात पे झगड़ा हो जाना
एक ही थाली में चार लोगों का साथ साथ खाना
वो जब रात को सुनाती थीं दादी कहानी
वो कहानियाँ नही लगती अब भी पुरानी
वक्त के साथ ही सब कुछ बदल जाता है
वक्त हाथ से रेत की तरह फिसल जाता है
गुजरा हुआ पल कभी बापस नही आता है