हर वक्त तेरी बातें तेरी यादें दिल पर तेरा कब्जा लगता है,
यकीनन तुमसे प्यार है मुझको और वो भी सच्चा लगता है |
तुम मुझसे जियादा झूठ ही बोलते हो ये जानता हूँ मैं,
पर जब तुम पास होते हो झूठ भी सच्चा लगता है |
तुम जब भी दूर होते हो हमसाये से भी डर लगता है,
यही जब तुम साथ होते हो तो सब अच्छा लगता है |
किताबों की तरह बहुत से अल्फाज हैं दिल में,
तुम्हारी जुल्फ लहराने से पेज दर पेज खुलने लगता है |
यकीन करो जल्दी से किसी को मुंह भी नहीं लगाता,
यही जब तुम से गुफ़्तगू होती है तो अच्छा लगता है |
तू जब भी देर से आता है मुझसे नजरें चुराता है,
तेरा डर डर के मुस्कराना मुझे अच्छा लगता है |
जुस्तजू थी जिसकी 'रोहित' अब तुझको मयस्सर है,
किसी और की तलाश फिजूल जब वो ही अच्छा लगता है |
रोहित सिंह (सुलतानपुरी)
मयस्सर- प्राप्त
गुफ़्तगू- बातचीत
अल्फाज- शब्द
कब्जा- अधिकार
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें