समयक चक्र
के जनैत छल ,
डेग पचहत्तरी नपिते
पाओत करनि फल।
जे कहैत छल झुकल काहं के,
उठा लेलक तेकरा अहि पल।
अतेक घृणा दम्भ भरल छल,
खसि पड़ल सब मुँहे बल।
हरि लेल प्रतिशोधक ज्वाला,
पीवि लेल सब गंगाजल।
समयक संग सबटा बदलै छै,
नाम प्रभाव निश्चित पड़िते छै ।
समयचक्र सदिखन चलिते छै।
हिंद विश्व के मुकुट भाल पर,
सजल रहए अहिना अविचल।
रुबी झा
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