विज्ञापन

समयक चक्र

Rubi Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समयक चक्र
        
                                                    
                            
के जनैत छल ,
डेग पचहत्तरी नपिते
पाओत करनि फल।
जे कहैत छल झुकल काहं के,
उठा लेलक तेकरा अहि पल।

अतेक घृणा दम्भ भरल छल,
खसि पड़ल सब मुँहे बल।
हरि लेल प्रतिशोधक ज्वाला,
पीवि लेल सब गंगाजल।

समयक संग सबटा बदलै छै,
नाम प्रभाव निश्चित पड़िते छै ।
समयचक्र सदिखन चलिते छै।
हिंद विश्व के मुकुट भाल पर,
सजल रहए अहिना अविचल।

रुबी झा
,
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aalam-e-Ghazal Parvez

273 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

11917 कविताएं

View Profile