जाने क्यूं मेरे हाथ की चाय में वो स्वाद नहीं आता,
रोज़ कोशिश जारी है,
लेकिन ना जाने दिल को वो करार सा नहीं आता
आये भी कैसे इस कप में माँ का वो प्यार जो नहीं
वो सुबह, माँ की आवाज़ के दिन का शुरू होना,
चाय का कप सिरहाने के साथ तैयार होना
उठ जाओ बेटा, सूरज चढ़ आया सुनते ही मेरा आंखें मलना,
और उस कप का पहला सिप लेते ही मानो मोक्ष सा मिलना
अब कभी जब माँ के घर जाती हूँ, ठीक वही स्वाद पा जाती हूँ
पर यार मेरे हाथ की चाय में वो स्वाद नहीं आता,
रोज़ कोशिश जारी है, लेकिन नाजाने दिल को
वो करार सा नहीं आता
आये भी कैसे इस कप में माँ का वो प्यार जो नहीं...
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