हरदम गुस्ताखियां करते इस दफा माफ करो
मोहब्बत को पाने में हमारा अब इंसाफ करो
वो बे ज़र बदमाश तंग करते रहते बार-बार
अब तो नौबहार की नमाज में साफ करो।
बे ज़र = कंगाल, निर्धन
नौबहार = वसंत आरंभ
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