मुख्तसर सी ज़िन्दगी में,
तुफान रोज़ आते हैं।
इस बेरुखी सी दुनिया में,
हम ख़ुद ही खो जाते हैं।
जरा निगाहें हटी नहीं,
आजकल हादसे हो जाते हैं।
कौन किसे समझेगा यहाँ,
अब तो अपने भी बेगाने हो जाते हैं।
रात तो बहुत पुरानी है,
पर ख्वाब रोज नये आते हैं।
नींद आये या न आये फिर भी,
सपने रोज सजाते हैं।
मंज़िल की बात ना करो,
अब तो रास्ते भी थकाते हैं।
मुखतसर सी ज़िन्दगी में,
तूफ़ान रोज़ आते हैं।
-Saher fatima
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