वो सौदाई सा सुनता रहा फसाना मेरा,
जिगर के चाक होने तक।
हुश्न की बिजलियाँ रह-रह के गैरों पे गिराता रहा,
जिगर के चाक होने तक।
मैं हुआ बेशक्ल और वो संवरता रहा,
जिगर के चाक होने तक।
मैं हुआ मजबूर और वो मुस्कुराता रहा,
जिगर के चाक होने तक।
महफिलें लुटी मेरी,वो शेर सुनाता रहा,
जिगर के चाक होने तक।
रुस्वा करके वफ़ा के गीत गाता रहा,
जिगर के चाक होने तक।
-सलिल सरोज
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।