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वाक़या

Salil Saroj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह जो नया शहर बसा है यहाँ
        
                                                    
                            
कहीं कोई गाँव तो उजड़ा होगा

ज़मीं बेआबरू होकर बंजर हुई
टिड्डों का काफिला गुज़रा होगा

शेख साहब महफ़िल में आ बैठे
अब दुआओं में भी मुजरा होगा

यहाँ हवाएँ बहुत शान्त लगती हैं
पास जरूर दर्द का हुजरा* होगा

दो लोग बैठे और फैसला हो गया
बेटी की किस्मत का माजरा होगा

यहाँ जिसे चलानी है,चल जाएगी
इन मुर्दों को न शिकन जरा होगा

*हुजरा-कोठरी

सलिल सरोज

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