यह जो नया शहर बसा है यहाँ
कहीं कोई गाँव तो उजड़ा होगा
ज़मीं बेआबरू होकर बंजर हुई
टिड्डों का काफिला गुज़रा होगा
शेख साहब महफ़िल में आ बैठे
अब दुआओं में भी मुजरा होगा
यहाँ हवाएँ बहुत शान्त लगती हैं
पास जरूर दर्द का हुजरा* होगा
दो लोग बैठे और फैसला हो गया
बेटी की किस्मत का माजरा होगा
यहाँ जिसे चलानी है,चल जाएगी
इन मुर्दों को न शिकन जरा होगा
*हुजरा-कोठरी
सलिल सरोज
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