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उसमें हो थोड़ी जगह मंदिर की भी और मज़ार की भी

Salil Saroj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं धर्म की दलील देकर इन्सान को झुठला नहीं सकता
        
                                                    
                            
मुझको तमीज है मजहब की भी और इंसानियत की भी

ज़मीर भी गर बिकता है तो अब बेच आना प्रजातंत्र का
मुझको समझ है सरकार की भी और व्यापार की भी

जो मेरा है मुझे वही चाहिए ना कि तुम्हारी कोई भीख
मुझे फर्क पता है उपकार की भी और अधिकार की भी

वोटों की बिसात पर प्यादों के जैसे इंसां ना उछाले जाएँ
मुझको मालूम है परिभाषा स्वीकार और तिरस्कार की भी

अपने दिल को पालो ऐसे की खून की जगह ख़ुशी बहे
उसमें हो थोड़ी जगह मंदिर की भी और मज़ार की भी

सलिल सरोज

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7 वर्ष पहले
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