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फ़लसफ़ा

Salil Saroj

Mere Alfaz
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                            बच्चियाँ सदियों से चिल्ला रही हैं,
        
                                                    
                            
ज़माने को सुनने का अब हौसला हुआ है।

हम-तुम अब भी वहीं हैं,
फिर कैसे रिश्तों में इतना फासला हुआ है।

आवाम कफन बेचने लगी है,
सियासतदानों में कोई अहम फैसला हुआ है।

राम -रहीम बदनाम हो गए यूं ही,
हिन्दू-मुसलमानों में यकीनन मसला हुआ है।

हिंदी के गले उर्दू मिली है रो-रो के,
शहर में मुशायरा तो कहीं जलसा हुआ है।

- सलिल सरोज

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8 वर्ष पहले
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