बच्चियाँ सदियों से चिल्ला रही हैं,
ज़माने को सुनने का अब हौसला हुआ है।
हम-तुम अब भी वहीं हैं,
फिर कैसे रिश्तों में इतना फासला हुआ है।
आवाम कफन बेचने लगी है,
सियासतदानों में कोई अहम फैसला हुआ है।
राम -रहीम बदनाम हो गए यूं ही,
हिन्दू-मुसलमानों में यकीनन मसला हुआ है।
हिंदी के गले उर्दू मिली है रो-रो के,
शहर में मुशायरा तो कहीं जलसा हुआ है।
- सलिल सरोज
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