तुमसे मिलने को मुझे वक़्त नहीं एक सदी चाहिए
समन्दर की चाहत में भागती पगली नदी चाहिए
खुदा अगर मस्जिदों में मिलता तो मिल गया होता
उसके दीदार को अपनी नीयत में भी बदी चाहिए
मंज़िल यूँ ही नहीं क़दमों में आके सिमट जाती है
अपनी कूबतों में कुछ देर ही सही, बेखुदी चाहिए
मैं स्वच्छंद हवा हूँ , यूँ बँध के तो जी नहीं पाऊँगा
मेरी नींदों को भी कोई लरी ख़्वाबों से लदी चाहिए
मुझको फक्र है मेरे मुल्को-मिल्लत की हर कदम
यहाँ हर बाशिंदे को जोशे-जूनून भी सरहदी चाहिए
सलिल सरोज
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।