क्षण क्षण जीवन
फिसल रहा है
रेत की भांति
हम बैठे हैं
खाली निठल्ले
ठूंठ की भांति।
जीवन की थाती
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जीवन की थाती
बड़ी अनमोल
चुकाया न जाए
इसका मोल।
व्यर्थ गबाए जाते हैं
जीवन को ,करते हैं
मिट्टी का मोल।
रात
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कारी कजरारी
रात आई
अमावस थी ,
निशिथ और गहराई,
न हुआ उजाला
मन के अँधेरे कोठर में।
माँ
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आज माँ,
अकेले ,तन्हा
खामोश बैठी है
शायद किसी ने पूछा नहीं
माँ तू कैसी है।
घर
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घर में ही
रहते हैं सब
पर कोई दिखता नहीं
रेल की पटरी
हो गए हैं सब
कभी मिलते ही नहीं।
- संदीप कुमार "सचेत"
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