कसूर नहीं मेरा कुछ
यूं कोख में न मारो तुम
जीने की चाह है मेरी भी
यूं भ्रूण में न मारो तुम।।
अभी बोल नहीं पाती हूं
लेकिन समझ तो जाती हूं मैं 'मां'
दुनिया की इस दरिंदगी से
सिसक-कर रह जाती हू मैं 'मां'।।
भाई की तरह मुझको भी
जीने का अधिकार दे दो 'मां'
कल हो सकता है बादलों को चीरकर
मैं भी ऊंची उड़ान भर दूं 'मां'।।
खिलने दो सरस मुकुल को
अपने घर के आंगन में
वादा करती हूं, मैं भर दूंगी
तेरा घर खुशियों के दामन से।।
स्निग्ध पाकर तेरा मैं
कांटों में भी राह बना लूंगी
तू बस साथ मेरा दे दे
रुखी-सूखी खाकर मैं भी रह लूंगी।।
नारी की शक्ति को क्यों सब
कम करके आंकते हैं
एक सतोगुणी नारी दुर्गा भी हैं
क्यो भूल सब जाते हैं।।
क्या बिगाड़ा होता है, उस
पांच, छ: साल की छोटी बच्ची ने
जिसे तुम वात्सल्य की जगह
अपनी वासना का शिकार बनाते हो।।
समझ नहीं आता कि
ईश्वर की सर्वोत्तम रचना को
क्यों सब पग-२ में ठुकराते हो
अरे, नारी से है अस्तित्व तुम्हारा
और सब मिल नारी का ही गला दबाते हो।।
कसूर नहीं मेरा कुछ
यूं कोख में न मारो तुम
जीने की चाह हैं मेरी भी
यूं भ्रूण में न मारो तुम।।
- संदीप शिवहरे
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