राहों मे खोए है आज कल
मंजिल का पता ठिकाना नहीं,
मुस्कुराने क़ी वजह ढूंढते हैं
रुलाने का कोई बहाना नहीं,
लाख कोशिशें क़ी है मैंने
कुछ ना कुछ पीछे छूट ही जाता है,
नादान सा दिल है मेरा
चाहूँ न चाहूँ आख़िर टूट ही जाता है,
लोग आज कल मिलते हैं
यारों से मिले जमाना हुआ है,
बड़ी जल्दी में है, अब जिंदगी
जब से वो बचपन पुराना हुआ है,
किताबें पढ़ना अब शौक़ भर रह गया है
कहानियाँ अब जिंदगी में चलती है,
हज़ारों यादें लौट आती है
जब कहीं से कोई तस्वीर निकलती है,
मिलना मिलाना अब नहीं होता
अकेलेपन का किनारा मिलता है,
भीड़ लग जाती है लोगों क़ी यूँ
पर किसी एक क़ी ही बातों में सहारा मिलता है,
लफ़्ज़ अब काफी नहीं होते
ख़ामोशी से इक़रार होता है,
रूह-ओ-दिल क़ी अब बात नहीं होती
अब तो सोच समझकर प्रेम होता है,
सच अब कागजों पे रह गया है
फरेब क़ी मीनार होती है,
हमदर्द शायद ही कोई मिले
पर रिश्तेदारों क़ी कतार होती है,
-संजय सिंह किर्तुनिया
खटीमा "उत्तराखंड"
(ऊधम सिंह नगर) 'देहरादून'
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