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माँ

Sanket Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुबह पलक खुलते ही
        
                                                    
                            
मन सहसा घबराया
नींद मेरी तब खुल गई
जब माँ तेरी आहट पाया
पर जब तू कहीं न दिखी
तो मन बरबस मुरझाया।

उठ जा,चाय है
का बहाना बनाकर
तेरा मुझे सुबह में जगाना
काफी खलता है माँ
तेरी डाँट को अब न सुनना।

तू जो यहाँ नहीं है
घर काटने को दौड़ता है
कभी-कभी ये पूछता है
क्या सपनों के खातिर
कोई माँ से बिछड़ता है?

मन जब मेरा तड़पता है
माँ तेरी याद आती है
तू भी तब तड़पती है माँ
रब की यब कैसी नियत है?

हम एक दिल दो जान हैं
तुझसे ही मेरी पहचान है
मेरे दिल में हमेशा ओ माँ
तेरे लिए खूब सम्मान है।

हाँ बात ये अलग है कि
कभी जाहिर न कर पाया
मेरी रोम-रोम में तू है शामिल
कभी मैं साबित न कर पाया।

मेरे इस अंजान सफर में
मेरा कोई नहीं यहाँ अपना
अरसे बीत गए, जब वो
तेरा,मुझे रूठने पर मनाना।

बचपन से ही ए मेरी माँ
तूनेअपने हाथों से खिलाई है
तरस गया हूँ अब तो बस
जो तुमने रोटी के साथ मुझे
कभी डाँट भी पिलाई है।

अदब,संस्कार और तहजीब
माँ तुझसे ही सीखी है
खुद जीवन भर घुटकर
मुझे शेरों सा पाली है।

पर कभी सोचता हूँ मैं
दूर तो अभी जरूर हूँ
पर तेरे लिए ही तो माँ
मैं दिन रात मेहनत करता हूँ।

तेरे लोरियों में तब रोज मैं
चाँद से बातें करता था
अब भी चाँद को देखता हूँ
पर बातें न कर पाता हूँ।

तू मोम सी पिघलती भी है
तू ज्वाला सी जलती भी है
पूछता हूँ अभी भी तुझसे
क्या तुम भी कभी थकती है?

जिस दिन मैं सफल होऊँगा
तब पूरी तेरी मन्नत होगी
पर वो क्षण मेरे लिए माँ
किसी जन्नत से कम न होगा।
-संकेत शौर्य


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