स्कूल जाते हुए वह
रोज हमें कहता था
नमस्ते दीदी
मैं चुप होकर
बस उसे देखती
रहती थी
पढऩे में होशियार था
हर बार अव्वल आता था
वह बड़ा था उम्र में
हमसे कई साल
फिर भी कहता था
नमस्ते दीदी
मैं बड़ी हो गई
स्कूल छूटा कालेज आ गई
सखी और दोस्त बने
पर कोई न मिला
जो कहे
नमस्ते दीदी
फिर एक दिन
खड़ी थी स्टापेज पर
ढलती शाम, लग रहा था डर
उसके दो शब्द अब भी
गूंज रहे थे मस्तिष्क में
नमस्ते दीदी
वहां कोई न था, बस
कुछ मनचले थे वहां
जो कर रहे थे छींटाकशी
तभी वह अचानक आया
और बोला
नमस्ते दीदी
वह था बाइक पर
लगाए था हेलमेट
मैं पहचान न सकी
लेकिन न जाने क्यों
अहसास जगा, कानों में गूंजा
नमस्ते दीदी
तभी उसने कहा साधिकार
बैठो मैं छोड़ देता हूं
न जाने क्यों मैं
चल दी उसके साथ
फिर वह हंसकर बोला
नमस्ते दीदी
अहसास जगाते हैं शब्द
रिश्ते बनाते हैं शब्द
शब्दों से मत खेलो
करो सम्मान इनका
यही तो है
हमारी संस्कृति
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