तमाम रात उसकी हंसी की याद में मस्त रहा ।
तमाम दिन उन बोझल आंखों में पस्त रहा ।
उसने भी मुझे थोड़ा देखा , थोड़ी बात भी हुई ।
यार वो पहली मुलाकात का वाकया ज़बरदस्त रहा ।
तेरा आना ही वजह था शायद की कोई गड़बड़ी नहीं की ,
वरना तमाम उम्र मैं बेतहाशा अस्त व्यस्त रहा ।
जहां उनको रिकॉर्ड करना था और जहां वो बैठे थे ,
किसी न किसी बहाने से मैं वहीं लगाता गश्त रहा ।
थकन भरे लहजे में लिखता था अशआर यूँ ही ,
मेरी शायरी में जान डालने वाला दिन 6 अगस्त रहा ।
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