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मन और मुक्ति

Satya Pathak

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन में है एक खोह,
        
                                                    
                            
लेता हूं मैं उसकी टोह।
दूर तक फैली हैं गुफाएं,
मन की व्यथा को छुपाए।
खामोशी मे सांसे टटोलती हैं,
भावों को मुखड़े पर उकेरती हैं।
निशब्द हूं मैं अंतर्मन के शब्दो से,
लफ्ज़ नही हैं घाव उसका भरने को।
सहमा है मन काम,क्रोध, मद,लोभ से
मिलेगी मुक्ति तेरे खुद के अपने क्षोभ से।
3 वर्ष पहले
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