कुछ नदियों से सीखो,
कुछ झरनों से सीखो,
निश्छल,अविरल देते रहते,
तरुवर, गुल्मो से सीखो।
प्रकृति का स्पंदन चिरंतन,
देता ही तो रहता है,
निः स्वार्थ,निर्बाध,देती है मां,
कुछ तो उससे सीखो।
लेते ही रहना,और कुछ ना देना,
यह प्रकृति बदलनी होगी,
शोषण को त्यागो हे मानव,
धरा मां को सच्चा पोषण दो।
बहुत हुआ,अब तो अति हो गई,
धरा का सौष्ठव,सुकुमारता प्रकृति की,
विकल जीव जंतु आज, जग के सभी,
लूटा जो उसे आज वापस लौटाना है।
सत्यप्रकाश अवस्थी, पी डी नगर, उन्नाव
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