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इन्तज़ार

Satyam Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्यार की कश्ती यूँ ना डगमगाएगी 
        
                                                    
                            
इन नैनन में है तेरी राह फिर लौट के कब आएगी
वो सुकून तेरी पनाहों में वो ज़िक्र मेरे अल्फ़ाज़ों में
दबी दबी पैरों से चल के आएगी 
मिटा के दिल की कसक तिश्नगी कामिल कर जाएगी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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