सौंदर्य का बखान, प्रेमियों का गुणगान हूँ;
अनेक रंगों का मैं, सुगंध का पैगाम हूँ;
काँटो के बीच से, निकलने का राह हूँ;
मेरी जवानी, मैं खिला फूल गुलाब हूँ।
प्रेम-रस से ओत-प्रोत, आकर्षण में चार-चांद हूँ;
रूठे को मनाने में, मैं यौवन से निहाल हूँ;
जग में प्रेम-रस का, मैं एक मिसाल हूँ;
काँटो से निकला, मैं फूल गुलाब हूँ।
देवो के मस्तष्क पर, पड़ा मैं अभिमानी हूँ;
वीर-भूमि की रक्षा में, शहीदों से सम्मनित हूँ;
जन्म-जन्मांतर के बंधन में, मैं पुष्प-रूप जयमाला हूँ;
सबका सम्मान, मैं फूल गुलाब हूँ।।
मैं फूल गुलाब हूँ।।
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