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अलविदा

Seema Dabral

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द अगर तन का होता,तो मरहम करते,
        
                                                    
                            
दर्द मगर मन का था, हम क्या करते,

सारी रात रोता रहा, हमसफ़र  मेरा,
हम  सुलाह  ना  करते  तो क्या करते।

फखत रूठ जाने की, आदत उसकी नहीं,
हम उससे शिकवे करते भी तो क्या करते।

वो मिला हमें जिंदगी की सुनसान राहों में,
हम उसे अपने साथ ना करते तो क्या करते।

हम खेल रहे थे जुवा जिंदगी पर अपनी,
तो उसकी जिंदगी पर दांव हम कैसे चलते।

वह बेखबर सा  था ,  हालात से मेरे,
हम हालात बता कर उसे कैसे छलते।

छोड़ आए हैं आज, उसे उसके हाल पर,
साथ लेकर उसे अब बरबाद कैसे करते।

चेहरा हाथ में लेकर उसका चूमते रुखसती पर,
पर फिर अलविदा कहने की हिम्मत कैसे करते।

- सीमा डबराल

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले
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