मैं नदी हूं ।
किनारा नहीं धार हूं ।
जीव का प्राण हूं ।
मुझे रोको मत ।
बह जाने दो ।
बहना ही मेरी नियति है ।
मेरे प्राणों की परवाह नहीं ।
मेरे उदर में कईयों जीव हैं ।
मेरा बहाव जीवों का पोषण है ।
धरा का प्राण है ।
मैं सूख गई ।
असमय जीव मर जाएंगे ।
कईयों कुपोषण के शिकार हो जाएंगे ।
धरा निष्प्राण हो जाएगी ।
सभ्यताओं ने मेरी गोद में जन्म लिया ।
मैंने पाला पोसा , समृद्ध किया ।
मेरे दोनों किनारे इतिहास हैं ।
मैं देवों की पर्याय हूं ।
मेरे किनारे शंकर , कृष्ण और राम हैं ।
मैं भूली नहीं ।
बहती रही ।
अपने धार में अवसादों को बहाती रहे ।
मैं रुक गई गाद जम जाएगी ।
प्रकृति की सांस थम जाएगी ।