है समाज एक व्यवस्था केवल
बनाती सामाजिक मनुष्यों को
बिन समाज क्या करें कल्पना
है संस्था हमें जोड़ने को
निर्भर है हम इस पर
हमारे बिना ये अधूरी है
आओ मिलकर पूरी करें
व्यक्ति की व्यक्ति से जो दूरी है
एकजुटता आवश्यक है
समरूपता आवश्यक है
हो शुद्ध हर मन और भावनाएं
सुंदर समाज बनाने को
रूढ़ियां,कुरीतियां और
बुराइयां जो फैली हैं
कुछ दुष्ट हृदयों के रहते
असामाजिकता जो फैली है
उठाना होगा बीड़ा रोकने का
अत्याचारों,बढ़ते अपराधों को
चाहिए मानवता भरा हृदय
हमें,स्वयं को मानव कहलाने को
है समाज एक व्यवस्था केवल
बनाती सामाजिक मनुष्यों को
बिन समाज क्या करें कल्पना
है संस्था हमें जोड़ने को
शालिनी शर्मा"स्वर्णिम"
इटावा, उत्तर प्रदेश
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