जीवन का भ्रमर क्यों क़ैद हुआ माया की मृदुल कमलिनी में;
नीचे जिसके पानी व पंक,ना रहा सुवास भी तन,मन में।
हरे,हरे उन गोल,गोल पत्तों के नीचे की दुनिया;
उन्मुक्त गगन में उड़ने वाली,बंद है पिंजरे की मुनिया।
हर नीति में,हर रीति में,कई बंधन दिखते हैं सारे;
माटी की नश्वर देह में भावुक,राम भी लगते हैं प्यारे।
एक हृदय ही शायद चीज़ है वो जो अंतर यहाँ बनाती है;
हुआ कृष्ण का स्वर्ग गमन,पर ज़िंदा जगन्नाथ कहलाती है।
नख से शीष तक चलती आयी,गंगा,गंगासागर में;
ये भाव ही थे,ये प्यार ही था,संसार बसा दिल गागर में।
आसक्त हुआ मन राजहंस,अरमान की उज्ज्वल हंसिनी में;
काठ को भी जो काट सके वो भंवरा क़ैद कमलिनी में।
शम्भू कुमार सिँह 'सहसरामी'
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