जो यज्ञ के ताप से निकली थी
थी द्रोपद की द्रौपदी वो।
ना बचपने की अनुभवी थी
थी यौवन की युवती वो।
अर्जुन की होकर भी वो सम्मान से वंचित थी
थी कुंती के वचनों से पांचों भाइयों की पत्नी वो।
कुलवधु थी पांडव की फ़िर भी हुई अपमानित थी
द्रुपद की द्रौपदी से पांडवों की पांचाली वो।
एक खेल ऐसा खेला जिससे हुईं वो शोषित थी
पांचाली से बनी दुर्योधन की दासी वो।
खींचे बाल लाई सभा में किया वस्त्र हरण ऐसे हुई अपमानित थी
फ़िर दासी से हुई कृष्णा की भक्तन वो।
सभा में बैठे प्रत्येक की वधू थी
फ़िर क्यों हो गए सभा में बैठे सारे नपुंसक वो।
सारी सभा झुकाए नज़र थी
ऐसे मे कृष्ण को क्यों ना पुकारती वो।
कृष्ण की भक्ति से ही देखी चमत्कारिक शक्ति थी
एक चीर का ऋण फ़िर कृष्ण ने उतारा वो।
अपमानित हुई सभा में ही बोली उसी सभा में थी
खुले केश में पांडव लेंगे मेरा प्रतिशोध वो।
सारे रिश्तों को भूल कर लाईं सबको रण में थी
अपमानित से महाभारत की कारण बनी अब वो।
कोई बने ना द्रौपदी अब ऐसी शक्ति बनना है नारी को
अपने ही हाथो से दुशासन का संहार करे वो।
फ़िर कोई दुर्योधन उसे सभा में खींच नही सकता
आज की नारी को कोई रोक नहीं सकता।
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