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जुदाई

Shashikant Ojha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसे मैं कभी और पा भी नहीं सकता
        
                                                    
                            
एक लफ्ज़ बात उससे कर भी नहीं सकता

तलब इतनी कि उसे बाहों में भर लूं मैं
मजबूरी ऐसी कि उसे देख भी नहीं सकता

वो इक परछाई की तरह साथ तो रहती है
मगर में चाहकर उसे पकड़ भी नहीं सकता

वो मेरे ज़हन में बैठ गया है, मैं क्या करूं
उससे जुदा इक पल हो भी नहीं सकता

खुशबू की तरह खिलती तो है मेरे आंगन में
हाल ऐसी कि महसूस कर भी नहीं सकता

बहुत तड़पता हूं रात भर सोच सोच कर उसे
हालात ऐसी कि मैं उसे भूल भी नहीं सकता

खुदको बेच दी थी मैंने बाजार-ए-ईश्क में
अब तो गुलाम हूं ,रिहा मैं हो भी नहीं सकता

वो आयेगी तो सारे गम हो जायेंगे दूर मेरा
मगर रूठी जो है ,वो आ भी नहीं सकता

इसी महफ़िल में मेरे बहुत करीब तो है वह
मगर मैं चाहकर उसे छू भी नहीं सकता
 
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