उसे मैं कभी और पा भी नहीं सकता
एक लफ्ज़ बात उससे कर भी नहीं सकता
तलब इतनी कि उसे बाहों में भर लूं मैं
मजबूरी ऐसी कि उसे देख भी नहीं सकता
वो इक परछाई की तरह साथ तो रहती है
मगर में चाहकर उसे पकड़ भी नहीं सकता
वो मेरे ज़हन में बैठ गया है, मैं क्या करूं
उससे जुदा इक पल हो भी नहीं सकता
खुशबू की तरह खिलती तो है मेरे आंगन में
हाल ऐसी कि महसूस कर भी नहीं सकता
बहुत तड़पता हूं रात भर सोच सोच कर उसे
हालात ऐसी कि मैं उसे भूल भी नहीं सकता
खुदको बेच दी थी मैंने बाजार-ए-ईश्क में
अब तो गुलाम हूं ,रिहा मैं हो भी नहीं सकता
वो आयेगी तो सारे गम हो जायेंगे दूर मेरा
मगर रूठी जो है ,वो आ भी नहीं सकता
इसी महफ़िल में मेरे बहुत करीब तो है वह
मगर मैं चाहकर उसे छू भी नहीं सकता
-हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।