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या खुदा

Shekhar Vats

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            या खुदा
        
                                                    
                            
जाँ बेजुबाँ की लेकर तू खुदा हुआ कैसा
हैवानियत में तू भी इनसान हो गया है
अड़चन ज़मीर की थी, उसको भी मार डाला
फतवों से काम मेरा आसान हो गया है
ईमान किताबों की कैसे करे गुलामी
ईमान से बड़ा क्या फरमान हो गया है
तेरा ही नाम लेकर, था हुआ कत्ल मेरा
तू खौफपरस्ती का अब सामान हो गया है
पहले जो पत्थरों में पड़ता था तू दिखाई
वह आशियाना भी अब वीरान हो गया है
इन्सान की शक्ल में मिलते हैं कुछ फरिश्ते
किस बदनसीब का तू मेहमान हो गया है
नाकाम है अगर तू, मेरा गुनाह क्या है
क्यूँ सजायाफ्ता हिंदुस्तान हो गया है 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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