या खुदा
जाँ बेजुबाँ की लेकर तू खुदा हुआ कैसा
हैवानियत में तू भी इनसान हो गया है
अड़चन ज़मीर की थी, उसको भी मार डाला
फतवों से काम मेरा आसान हो गया है
ईमान किताबों की कैसे करे गुलामी
ईमान से बड़ा क्या फरमान हो गया है
तेरा ही नाम लेकर, था हुआ कत्ल मेरा
तू खौफपरस्ती का अब सामान हो गया है
पहले जो पत्थरों में पड़ता था तू दिखाई
वह आशियाना भी अब वीरान हो गया है
इन्सान की शक्ल में मिलते हैं कुछ फरिश्ते
किस बदनसीब का तू मेहमान हो गया है
नाकाम है अगर तू, मेरा गुनाह क्या है
क्यूँ सजायाफ्ता हिंदुस्तान हो गया है
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