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तपन

Shishir Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुहब्बत जो दिल में बसी हो खुशबू निकलती है तन से
        
                                                    
                            
हमको है शिकवा कभी हम गुजरें ना ऐसे चमन से

मौसम बदलता नहीं है ये आग कितनी सहें हम
सूखी है अमृत की धारा भीतर सुनो इस तपन से

बोझा गमों का उठाए फिरते हैं हम तनहा तनहा
कब तक बचाएंगे खुद को तुम ही कहो हम वजन से

मुख से क्या बोला किसी ने उसका भरोसा नहीं है
हम तो मुहब्बत की बातें सुनते हैं केवल नयन से

दामन में कांटों का डेरा होता है मधुकर जहां पे
बचता नहीं है बशर वो जीवन में फिर तो चुभन से

- शिशिर मधुकर

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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