उदास और निराश
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास
कभी सोचता हूँ ये कर लूँ
कभी सोचता हूँ की हो जाता काश
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास....
मेरा दिल भी नही ये माने
बुनता है ताने बाने
बचपन के वो याराने खो गये कहाँ रब जाने
ज़िंदा हूँ मिलने की लेकर आस
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास....
हम प्यार उनसे करते हैं
वो एहसास नहीं करते हैं
हम उनकी याद में
दिन रात रोते रहते हैं
वो मेरे आँसुओ से
बुझा रहे हैं अपनी प्यास
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास....
मैं यही चाहता हूँ
मैं यही सोचता हूँ
उनको भी हो जाये
मेरे प्यार का अहसास
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास....
उसने मोहब्बत का किया नही आगाज़
इसी कारण भूल गये हम
अपना साजो-साज़
टूट रही है धीरे धीरे
अब तो मेरी साँस
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास....
वीरानी सी उन रातों में
उन ख्वाबों में उन बातों में
हसीन सी उन मुलाकातों में
न मरने की रही आरज़ू
न जीने की रही आस
कैसी ज़िंदगी है मेरे पास
निराश और उदास...
उदास और निराश.....
- शिवकुमार मित्तल
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