तुम बिन सूना है ये आँगन,
तुमसे ही तो रौशन था मेरा बचपन।
याद है तुझको?
कैसे तुम्हारी आँखें टटोलती थीं मुझको
जब भी मैं घर से था बाहर जाता,
घर पहुंचने की देर ना थी
कि फट से बस एक ही सवाल तेरे मुख से था आता,
ऐसा भी क्या काम है जो इतनी देर से तू है आता।
याद है मुझको
कैसे मेरी कामचोरी पर तुमने मुझे ताने सुनाए
कैसे हमेशा सही गलत की सीख दी और कैसे
बचपन में वो पहाड़े याद कराए
कैसे हर बीमारी का इलाज़
तेरी उस मालिश में था,
आज समझ आया
तेरा मेरे पास रहना ही
मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश में था।
याद है ना तुमको
जब भी झूठ बोला मैं
मुस्कुरा कर तूने फिर भी प्यार किया,
तेरे लाड प्यार और संस्कारों का नतीजा ही तो है
कि किसी की मदद के लिए कभी नहीं इनकार किया
एक बात को दस बार पूछने की तेरी वो आदत
अब रुलाती है,
काश तुम्हें बता सकता अम्मा
तुम्हारी कितनी याद आती है।
- शिवम गुप्ता
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