काम अराजक हो जाए
तो शब्द बाण भी क्या कर लेंगे
इंसा में इंसान नहीं जब
संस्कार ही क्या कर लेंगे
आग लगी हो जब तन मन में
क्षुधा तृप्ति तक जाएं कैसे
बना जानवर घूम रहा है
लाज शर्म भी आए कैसे
पाप पुण्य का भेद नहीं है
अन्तर्मन समझाएं कैसे
मानवता जब खत्म हो गई
सुविचार ही क्या कर लेंगें
इंसा मे इंसान नहीं जब
संस्कार भी क्या कर लेंगे
नारी को तो बना दिया है
सबने मिल कर एक खिलौना
अश्क बहाए पाले पोसे
बन जाए जब कहो बिछौना
ममता का जब मान नही है
लाड प्यार ही क्या कर लेंगे
इंसा मे इंसान नहीं जब
संस्कार ही क्या कर लेंगे
घूँघट हो या खुला जिस्म हो
बूढ़ी हो या नन्ही बच्ची
सब पर है कुदृष्टि गिद्धों की
बात करे सब अच्छी अच्छी
जब अन्तर मे धारण ना हो
सदाचार भी क्या कर लेंगे
इंसा मे इंसान नहीं है
संस्कार भी क्या कर लेंगे
डॉ.शिवानी सिंह
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