चाँद देखा और उसकी चमक की नज़ाकत देखी।
आसमान में उसे अकेला देखा और ख़ुद की भी तन्हाई देखी।
भीड़ में भी तन्हा पा रही हूँ ख़ुद को, आज मैंने अपनी तबाही देखी।
वजूद खो रहा है मेरा, मैंने सच्चाई ताबीर की देखी।
ख़्वाबीदा सी हो गयी है ज़िंदगी, मैंने सुकून कहाँ है देखी?!
मैं मुंतज़ीर उस पल की फ़िर से हूँ, जब मैंने इस संजीदगी में अपनी रूहानियत देखी!
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