मानव मानव प्रेम से, रंग लगाते अंग।
रंग अधिक लगने लगे, हमको अब बेरंग।।
रंगों के जलधाम में, खोए सारे बूँद,
मिलकर मानव हम गले, प्रेम एकता संग।।
नवल वर्ष में हम सभी, मिले एक ही रंग।
अनेकता में एकता, देख जगत् है दंग।।
होली दीवाली भले, मानव होते एक,
देख रंग को मन में, उठने लगे तरंग।।
होली के त्योहार में, रंगों के बरसात।
रंग रंग मन रंगते, मैल झरे तरु पात।।
मतवाला हो पर्व में, रंग लगा पर गाल,
यारों तो मिलते गले, बैरी करते घात।।
- सीताराम पटेल 'सीतेश'