वो महकी सी मिठास,
वो उलझानो की खराश
कुछ पूरे, कुछ अधूरे
मेरे ही बनाए दायरे
भर देती खुशियाँ दोनो हाथों से,
हो जाते सब तुम्हारे
ए जिंडाई काश तू ऐसे होती,
थोड़ी सुन लेती मेरे भी कभी
ये या डब्ल्यू, कभी हा कभी ना
इनमे से कुछ तोड़ा और वक़्त जोड़ पाती
वक़्त चुरा लेती मैं से
और मां को दे पति.
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