शहर
अपना पराया यहाँ समझ न आती
पैसा बटोरना ही शहर में जिंदगी कहलाती
यहाँ कल की सोच ने आज की नींद उड़ा दिया
बंद आंखों में सपने बिखर गये
आँसू गले से नीचे उतर गये
मिलकर कब खाया था याद नहीं
खुलकर कब हँसा था याद नहीं
यहाँ की हर गाडी अपने मालिक की तनाव भरी कहानी सुनाती
गाड़ी रुकती तो जिंदगी थम जाती
रेगिस्थान में पानी जैसे यहाँ खुशी मिलती
जिगीषा की दबाव में जिजीविषा ख़तम होती
यहाँ कुछ मिले न मिले – रोटी अवश्य मिलती .....अवश्य ...... अवश्य
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