मझधार में फसे है, किनारा अभी दूर है।
मंजिल को भी, मंजिल होने का गुरुर है।
निकल पड़े सफर पर, क्या खूब नजारे है।
गिर रहे है बार बार, पर हौसला ना हारे है।
ये किस्मत भी हुई बड़ी क्रूर है...
मंजिल को भी,मंजिल होने का गरुर है।
हसकर सारे गम को, दिल में दबाये रखा है।
कौन सोना है,कौन पीतल, हमने सबको परखा है।।
वो खिलता हुआ चेहरा,अब बेनूर है...
मंजिल को भी,मंजिल होने का गुरुर है।
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