जहां में वालिदा ऐसी कभी होती नहीं है
मिलें औलाद को ग़र कष्ट जो रोती नहीं है
बनाके तू न बेगाना इन्हें यूं छोड़ जाना
बिना दीदार के तेरे कभी सोती नहीं है
वाह रे ! क्या नसीब पायी है
जिंदगी में समृद्धि छायी है
रास आये कहाँ उन्हें रिश्ते
द्वेष की आदतें समाईं है
-सुभाष गुप्ता
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