एक किनारा ही तो है उसका दोस्त , जिससे
वो अपने सरे दुःख दर्द साझा करता है।
वो हर बार कुछ कहता है
वो हर बार कुछ किनारे के लिए लाता है
वो लहर ही है जिससे वो किनारे से मिलता है
लोगो ने लहरों को उसका प्यार समझा
किसी ने उसे समुद्र का गुस्सा समझा
किसी ने उसे अपने मनोरंजन का साधन समझा
और दोस्त ने उसे दोस्ती का पैगाम समझा ,
मैं भी किनारे पर खड़ा हो कर सुन रहा था , किनारे और समुद्र की बातो को
समुद्र ने भी मुझे नहीं ठुकराया शायद उसे भी ये नया दोस्त रास आया
माहौल कुछ रंगीन सा होता जा रहा था , जब
हर लहर मेरे पैरो को छू कर लौट जाया करती थी
मानो वो अब खेलना चाहती हो , मैं भी उसे अपनी दोस्ती का न्योता देता रहा ,
और उसी के पीछे बढ़ता रहा। धीरे धीरे वो लहर जो पैरो
में सुनहरा एहसास दे रही थी ,
अब वही मुझे डरा रही थी | शयद वो मेरी और इस नई दोस्ती की परीक्षा हो रही थी |
मैंने भी नये दोस्त (समुन्द्र ) का हाथ नहीं छोड़ा
और कर दिया समर्पण उसको।
कुछ दूर जा कर वो अब शांत और गंभीर सा लगा , शायद
अब वो मुझे दोस्ती के काबिल मान चूका था |
जो किनारे पर शांत और चंचल लग रहा था , वो भी कुछ गंभीर दिख रहा था।
वो जितना चंचल किनारो पर था , उससे कही
ज्यादा शांत और भावों से भरा लग रहा था।
शायद वो हर किसी को अपना गंभीर रूप नहीं दिखाने चाहता
शायद उसे अभी किसी पर इतना विश्वास नहीं रहता
शायद वो भी डरता होगा ज़माने से कोई हसना दे उसके इस स्वाभाव पर
उसे अभी किसी ने कहा होगा
"अपना जख्म उन्हें मत दिखाओ जिनके पास मरहम नहीं "
शायद इसी को वो निभा रहा है।
जब वो सहन नहीं कर पता होगा तभी वो अपना विकराल रूप सभी को दिखता होगा
गुस्सा दिखा कर डरता भी होगा। जब बाते अपनी सीमा से बाहर होती होगी
हर बार वो अपना रुद्रा रूप में अपना हाल सुनाता होगा ,अपनी ताकत दिखता होगा।
शायद डरता होगा वो उन्हें जिन्होंने उसकी मासूमियत का फयदा उठाया होगा |
लेखक :- सुधीर कुमार धोटे
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