करिश्मा
यह इस्त्री का करिश्मा है,
वो इंसा के वहसत के पनी को,
बदन की सीप मे रख कर इंसा बनाती है
बाजार में
क्या बेचकर खरीदें हम,फुर्सत ऐ जिन्दगी ,
सब तो गिरवी पड़ा है, अल्लाह के दरबार में
इसकी की उम्र
सहिब इश्क़ की उम्र और दौर नहीं होता,
जब भी होता है बे हिसाब होता है
फुरसत
फुरसत से आओ कभी हमारी महफिल में,
जाते वक्त दिल ना पाओगे अपने सीने में
सीखा नहीं
हम जोड़ना जानते हैं, मगर तोड़ना सीखा नहीं
हम खुद मिट जाते हैं, मगर किसी को छोड़ते नहीं
अंधेरा
है अंधेरा बहुत अब सूरज निकलना ही चाहिए,
जेसा भी हो यह मौसम बदलना ही चाहिए,
ये चेहरे बदलते हैं रोज, राज नकाबों की तरह,
अब जनाजा धूम से, इनका निकलना ही चाहिए.
- खत्री भेल बनारसी
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