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Sudhir Khatri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करिश्मा
        
                                                    
                            
यह इस्त्री का करिश्मा है,
वो इंसा के वहसत के पनी को,
बदन की सीप मे रख कर इंसा बनाती है
बाजार में
क्या बेचकर खरीदें हम,फुर्सत ऐ जिन्दगी ,
सब तो गिरवी पड़ा है, अल्लाह के दरबार में
इसकी की उम्र
सहिब इश्क़ की उम्र और दौर नहीं होता,
जब भी होता है बे हिसाब होता है
फुरसत
फुरसत से आओ कभी हमारी महफिल में,
जाते वक्त दिल ना पाओगे अपने सीने में
सीखा नहीं
हम जोड़ना जानते हैं, मगर तोड़ना सीखा नहीं
हम खुद मिट जाते हैं, मगर किसी को छोड़ते नहीं 
अंधेरा
है अंधेरा बहुत अब सूरज निकलना ही चाहिए,
जेसा भी हो यह मौसम बदलना ही चाहिए,
ये चेहरे बदलते हैं रोज, राज नकाबों की तरह,
अब जनाजा धूम से, इनका निकलना ही चाहिए.

- खत्री भेल बनारसी

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7 वर्ष पहले
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