तेरे नैनो से झलकता नीर
जब कपालौ से होता छलकता हे
मेरे हृदय को भेदता हे
तब अन्तरात्मा पीडा होती है
जब फूल से शब्द
हृदय के पटल पर
शूल से गढ़ते हैं
तब हृदय के पंख झड़ते हैं
जब नग्न नयन से
स्नेह के अंगारे बरसते हैं
तब ह्दय मे क्रीड़ाओं बहुत होती हैं
जब रह रह कर
अंगार टपकाते नेत्र
इन नयनो से टकराते हैं
तब ह्दय मै क्रीड़ाएँ बहुत होती हैं
वो मगध मुस्कान
जब कुटिल नयनौ में
छुब्द बन कर ढल जाते हैं
तब ह्दय मैं क्रीडा बहुत होती॒ हे
जब ह्दय में निर्जल सा
जल बनकर रह जाता हे
तब ह्दय में क्रीडा बहुत होती हे
जब ह्दय में प्रेम का रस
धल मे परिणित हो जाता हे
तब ह्दय मे बड जाते हैं
प्रेम के शूल
तब ह्दय में क्रीडायें बहुत होती हैं
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