जरा सोचिये और समझिये,
संसार के इन सम्बंधों का कटु सत्य
हम जिसे भुलाना चाहते हैं,
वह अटल परम सत्य
पुत्र है बहू की अमानत
पुत्री दामाद की अमानत
धन,प्रभुता, पद,प्रतिष्ठा
ये सब हैं भाग्य की अमानत
हमारा आज है हमारे
अगले-पिछले कल की अमानत
शरीर मृत्यु की अमानत
आत्मा परमात्मा की अमानत
फिर वह क्या है जिसे
हम अपना कह सकते हैं
जिसके भरोसे रह सकते हैं
जरा सोचिये और समझिये,
आपाधापी से समय निकालकर
नवचेतना से चिंतन को सँभालकर
हमारे पाप-पुण्य ही तो हैं
शायद हमारे वे अपने
जो साथ-साथ चलते हैं
पल-पल हिसाब करते हैं
हाँ, यही सब तो
तमाम उम्र की जमानत है
बस इन्हीं की अमानत है
हमारा शेष जीवन
और मृत्यु के बाद मिलने वाले
अनेकानेक जीवन
हो सके तो,
जरा सोचिये और समझिये
क्या यह जीवन का परम सत्य नहींं ?
क्या यथार्थ यह शाश्वत तथ्य नहीं?
हम जाने क्यों इसे भूलकर चलते हैं
जान बूझकर आँँख मूँदकर चलते हैं
द्वारा: सुधीर अधीर
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