ज़माने ने कैसा नशा धर्म का है किया ?
इंसान हो के भी इंसानियत को भुला है दिया।
लिए फिरते हैं अल्फ़ाज़ों के खंजर सराफत के लिबास में,
हुए सरेआम कत्लों का जिम्मा ना किसी ने लिया।
खुद के चंद ख़्वाबों के ख़ातिर,
न जाने कितने आशियानों को जला है दिया।
हाकिम उड़ाते रहे दावतें बैठे शामियाने में अपने,
यहाँ जमीदोजों के निवाले में किसी ने जहर मिला है दिया ।
न जाने उनका इल्म कैसा और किसका था ?
हाकिम ने आज पहरा इल्म पर भी लगा है दिया।
उनके किरदारों पर सवालिया निशाँ उठाये जायेंगे,
लेकिन खुद को भी उन गुनाहों से बरी नहीं है किया।
कुछ दाग क़त्ल-ए-अमद का है हमारे दामन पर भी,
हमने भी तो खुद को ताबूत-ए-पत्थर बना है लिया।
-- सुनील "सम्राट "(इलाहाबाद विश्वविद्यालय)