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दिल की आहट

Sunil Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं अपने दिल की तन्हाई , तुझे पैग़ाम देता हूं,
        
                                                    
                            
ज़िंदगी के सफ़र को , अब नया आयाम देता हूं।
पड़े थे राह में पत्थर, मेरे कदमों को आहट थी,
सुनाकर दर्दे दिल अपना, दिले अंजाम देता हूं ।
मुसाफिर हूं चला हूं मैं, राहें मंजिल की चाहत में ।
ज़िंदगी का सफर तन्हा, तुझे विश्राम देता हूं।
तमन्ना दिल थी मेरे, तेरे जुल्फों के साए में ,
पिला दू सुर्ख होठों से, ये पैमाने जाम देता हूं।
नशा तो खूब हुआ हमको , तुम्हारी बेवफाई का,
मुनासिब हूं नहीं तुमको , ना तेरा नाम लेता हूं ।
नसीबों का कहर देखो , सफ़र ही ज़िंदगानी का,
लगाकर आग सीने मैं , दिल को आराम देता हूं।
वफ़ा करते अगर हमसे, जमाना यूं नहीं होता
दिया है जख़्म का तोहफा, मैं कत्लेआम देता हूं।
हमारे अश्क़ की कीमत ,कभी समझे नहीं हो तुम,
तुम्हारा दर्द समझा था , तेरा ही दम देता हूं ।
लगा दो आग दुनिया में , नज़ारा फिर यही देखो,
करोगे ख़ाके दिल मुझको, तुझे ये काम देता हूं ।
मैं अपने दिल की तन्हाई , तुझे पैग़ाम देता हूं,
ज़िंदगी के सफ़र को , अब नया आयाम देता हूं।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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