विज्ञापन

कोरोना

Sunil Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जग में जिसकी दहसत जारी,
        
                                                    
                            
दिन दो-गुना, रात चौगुना,
जद में आती सबकी बारी,
फ़ैल रही ये बीमारी।

कालजयी इसका साम्राज्य,
हो नही रहा जिसमे सूर्यास्त,
सूनी गलियां-गोदाम,अट्टालिका-अटारी,
राजा-रंक सभी पर भारी।

चमके दामन मोती कांचन,
ठहरी रही जो सागर के आंगन,
सुनामी का कहर किनारो पर,
तो ठहरो अपने ठिकानों पर।

हो कर्मवीर तुम, धैर्यवान,
हो मर्मवीर तुम , विद्वान,
तुम्ही नियम और नियामक हो,
और तुम्ही कोरोना के नाशक हो।

जान है तो है जहान,
कोरोनामुक्त हो नवल विहान,
कुछ ही दिन की तो बात है,
जनता देश के साथ है।

-सुनिल "शाश्वत"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all