देखो ना!
कितने मुक्तिपथ हैं प्रकाश को ढ़ूढने के लिए
मैंने सिर ऊपर उठाकर आकाश की ओर,
कभी जानने की कोशिश नहीं की
कि प्रकाश आता किधर से है?
मेरी सोच के दायरे से बाहर
कभी जिज्ञासा भी नहीं हुई कि
प्रकाश के चरित्र का अवलोकन कर सकूं
ना ही कभी सूरज से
प्रकाश मांगने के लिए मेरे स्वावलंबन ने हामी भरी,
ना ही कभी चांद से मैंने मेरे घर के दरीचे से
भीतर झांकने की मिन्नतें की
देखो ना!
कितने मुक्तिपथ हैं प्रकाश को ढ़ूढने के लिए
मैं तो बस सिर झुकाये
अंधकार में ही अपना प्रकाश ढूंढती रही
मैंने टूटे दियों को जोड़कर ही
ताखे रोशन किये अपने हदय के
मैंने अपने घर की दैनंदिन क्रियाओं में ही ढूंढा
अपने हिस्से का अदना सा प्रकाश
मैंने शुरू की सुबह की सैर
मैंने घर के कोने-कोने को बुहारा
कभी झूला पेंट किया
कभी गमलों पर टैराकोटा पोता
और उन पर गेंदे के पौधे रोपे एक पांत में
मैंने घर के सारे पर्दे धुल डाले
घर के ड्राइंग रूम को एक नई शक़्ल दी
धो पोंछ लिये रसोई के सारे आटे और दाल के डिब्बे
बोई घर के बाहर मौसमीं सब्जियां
निकाली फटककर चावल से धान की भूसी
जिनका आसमां कालिख हुआ है
इस सदी की महामारी में
उनसे कहना है मुझे
देखो ना!
कितने मुक्तिपथ हैं प्रकाश को ढ़ूढने के लिए
तुम अंधकार के कस्बे से
रोशनीयों के नगर में भ्रमण करो
अंधकार के प्रतिकार में
रोशनी के लिए
मत करो सूरज और चांद से कोई उम्मीद
जहां-जहां तुम ढ़ूंढ सकते हो
टूटे दियों को ढूंढकर एकत्रित करो
अपनी खोयी हुई रोशनी का विकल्प ढ़ूढने के लिए
देखो ना!
कितने मुक्तिपथ हैं प्रकाश को ढ़ूढने के लिए
तेल में लबालब बटी हुई बातियां
महज़ रोशन करेंगी चौहद्दी की मुंडेर और ताखों को
हृदय में प्रकाश तो
टूटे दियों को जोड़ने से ही होगा ना!
मैंने ज़िंदगी के पन्नों पर
प्रकाश का लेखा-जोखा कभी नहीं किया
यही जानती हूं कि
टूटे दीयों को जोड़कर भी
प्रकाश अर्जित किया जा सकता है
प्रकाश देने की अद्भभुत क्षमता है टूटे दियों में
जहां-जहां तुम ढ़ूंढ सकते हो
टूटे दियों को ढूंढकर एकत्रित करो
अपनी खोयी हुई रोशनी का विकल्प ढ़ूढने के लिए
देखो ना!
कितने मुक्तिपथ हैं प्रकाश को ढ़ूढने के लिए
-सुनीता भट्ट पैन्यूली