आखिर यह कैसा नशा है इस दौर के नौजवानों में
बेफिक्र सो रहे हैं सभी जलते हुए मकानों में
शोले से उठ रहे हैं हर तरफ दिलो में आज
मुहब्बत का सैलाब पैदा करो इसे बुझाने में
करो फिक्र अब सारे मखलूक के हिफाजत की
खत्म हो जायेगी दुनिया खुद को अब बचाने में
इन्सानों के दिल हो गये आज मशीनों की तरह
गीता वो कुरआन बेअसर लगते इस ज़माने में
इन्सानियत का ये बदतर मुकाम है तरक्की
आदमी खुद उलझ गया है अपने ताने बाने में
छीन लो दर्द लाओ खुशहाली घर-घर में खालिद
लगा दो सारी उम्र ज़मीं पे जन्नत बनाने में