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दीपक

Surya Pratap Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चाह सभी की बनूं मैं दीपक,
        
                                                    
                            
पर ख़ुदगर्जी अवरोधक है,
जो परहित अर्पित कर दे सब कुछ,
है सबमे सामर्थ्य कहां?

मर्म जान सका, कहां है कोई:
दैदिप्यमान होने की ख़ातिर,
विपरीत गुरुत्व के प्रयत्न कर,
सर्वस्व न्योछावर स्वयं को,
आकण्ठ डूबकर जलना होगा।

थपेड़ो को खाकर झुुकना भी होगा,
झुककर पुनः सम्भलना भी होगा,
ख़ुद ताप सहकर दुनिया को प्रकाशित,
विषम परिस्थितियों में करना भी होगा।

दहका सको यदि अन्तर्मन की अग्नि को,
विस्मृति कर सको यदि स्वार्थपरता,
चराचर जगत को प्रतिबिम्बित कर दो,
आभास करा दो सारे जगत को, कि
उदयमान एक दीपक कही पर हुआ है,
उदयमान एक दीपक कही पर हुआ है।

प्रज्वलित हो ऐसे तिमिर छट जाए,
मलिन हुए चेहरो पर नूर बरस जाए,
निशा जैसे छिप जाए अरूण को देखकर,
रोशन हो जैसे "सूरज" और ऊषा आ जाए॥

....सूर्य प्रताप सिहं "सूरज"


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5 वर्ष पहले
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