तेरी आंखो से छलकता समंदर अच्छा नहीं लगता
तुझसे दूरी में मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
जब बहकर तेरी आंख से आंसू गिरता है जमीं पर
सच कहता हूं ये दर्द का पैमाना मुझे अच्छा नहीं लगता।
मेरे इश्क़ में है तू शामिल तो सब कुछ अच्छा है
तेरे ग़म में गुजरे दिनों का वीराना अच्छा नहीं लगता।
बेशक़ आशिक़ के दिल का क़रार उसकी महबूब है
हिज्र में काटी रातों का सफ़र मुझे अच्छा नहीं लगता।
मुसलसल वस्ल से मुझे ज़िन्दगी बख़्शता है वो
गर हो जाये जुदा वो तो मुझे अच्छा नहीं लगता।
तालिब हुसैन
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।