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ग़ज़ल - अच्छा नहीं लगता

Talib Hussain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरी आंखो से छलकता समंदर अच्छा नहीं लगता
        
                                                    
                            
तुझसे दूरी में मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

जब बहकर तेरी आंख से आंसू गिरता है जमीं पर
सच कहता हूं ये दर्द का पैमाना मुझे अच्छा नहीं लगता।

मेरे इश्क़ में है तू शामिल तो सब कुछ अच्छा है
तेरे ग़म में गुजरे दिनों का वीराना अच्छा नहीं लगता।

बेशक़ आशिक़ के दिल का क़रार उसकी महबूब है
हिज्र में काटी रातों का सफ़र मुझे अच्छा नहीं लगता।

मुसलसल वस्ल से मुझे ज़िन्दगी बख़्शता है वो
गर हो जाये जुदा वो तो मुझे अच्छा नहीं लगता।

तालिब हुसैन


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5 वर्ष पहले
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