ना वो हमें पहचान पाया
ना ही हम उसे पहचान पाए
वो दृढ़ता से कहता हम से अनजान है
हम उतनी ही दृढ़ता से उससे पहचानने का दम भर रहे
हम उसकी दृढ़ता को समझ नहीं पा रहे
वो हमारी नादानी को सरलता से समझ रहा है
वो हमारे जितना पास आता
हम उससे दूर हो रहे
वो हम पर मुस्कुरा रहा है
हम उतने ही विचलित हो रहे
वो तो कोई और नहीं स्वयं अस्तित्व है,हमारा
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